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असम मुसलमानों पर नागरिकता का संकट : होता है धर्म की बुनियाद पर नागरिकता में फर्क

 

Published on May 2, 2017 by INVC NEWS   ·   No Comments

 

आई एन वी सी न्यूज़

नई दिल्ली,

आज यहां जमीअत उलमा-ए-हिंद कार्यालय में असम में नागरिकता अधिकार के मसले पर एक अहम प्रेस कांफ्रेंस हुई जिसमें जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद असद मदनी, मौलाना बदरूद्दीन अहमद, एम पी,अध्ययक्ष, जमीयत उलमा असम, मौलाना नियाज अहमद फारूकी, सदस्य, वर्किंग कमेटी, जमीयत उलमा-ए-हिन्द, मौलाना हकीमउद्दीन कासमी, सचिव, जमीयत उलमा-ए-हिन्द, एडवोकेट मजहर भूतिया असम, आदी ने प्रेस के सामने असम में नागरिकता अधिकार के खिलाफ हो रही साजिष और दूसरे कानूनी पहलुओं पर रोषनी डाली। इस मौके पर मौलाना महमूद मदनी ने स्पश्ट तौर पर कहा कि असम आकोड की पासदारी करें और उसके अनुसार ही नागरिकता का फैसला हो। मौलाना मदनी ने आसाम में धर्म की बुनियाद पर नागरिकता में फर्क करनी की निंदा की और कही कि यह राज्य द्वारा अयोजित साम्प्रदायिकता है। जो देष के संविधान और धर्मनिरपेक्षता के विरूद्ध है। जमीअत ने सदैव संयुक्त राश्ट्रीयता की हिमायत की है। और उसने धर्म की बुनियाद पर दो राश्ट्र योजना का विरोध किया है। मौलाना मदनी ने कहा कि अगर यह प्रमाणित हो जाए कोई विदेषी व्यक्ति गैरकानूनी रूप में राज्य में आकर रह रहा है तो उसे तुरंत देष से निकाला जाना चाहिए, चाहे वह कोई भी हो, लेकिन किसी वास्तविक नागरिक ळमदनपदम बपजप्रमद को बिना सबूत परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

इस मौके पर मौलाना बदरूद्दीन अजमल ने कहा कि जमीअत के वरिष्ठ वकीलों की टीम ने दिनांक पहली मई 2017 को असम में नागरिकता से संबंधित मामलों में अपने रुख के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट में लिखित उत्तर और संबंधित आवश्यक दस्तावेज़ें प्रस्तुत करके इस बात की ज़ोरदार वकालत की है कि असम में नागरिकता के फैसले के लिए 25 मार्च 1971 को ही आधार स्वीकार किया जाए जैसा कि असम एकार्ड1985 में निष्चित है। पे्रस कांफ्रेंस में कई पहलुओं पर बात करते हुए कहा कि जमीयत के केन्द्रीय और असम राज्य के जिम्मेदारों ने कहा है कि असम में नागरिकता का मामला लगभग पिछले 38 वर्षों से बेहद गंभीर बना हुआ है और विदेशी के नाम पर राज्य में आबाद भारतीयनागरिकों को परेशान किया जाता रहा है जिसका सिलसिला आज भी जारी है और जिसको बहाना बनाकर दंगों की दर्जनों घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें हजारों लोगों की जानें जा चुकी हैं और करोड़ों की संपत्ति बर्बाद हो चुकी हैं। असम का इतिहास गवाह है कि विदेशी और खासकर बांग्लादेशी होने का आरोप लगाकर ग़रीब मुसलमानों का नरसंहार किया गया है जिसमें 1983 में हुए ’नैली नरसंहार’ कभी भूलया नहीं जा सकता जिस मंे लगभग 3 हजार लोगों को केवल 6 घंटे में मौत के घाट उतार दिया गया लेकिन पीड़ितों को आज तक न्याय नहीं मिला। इस नरसंहार को अंजाम देने वालों के खिलाफ आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई।

यह उल्लेखनीय है कि असम में 1978 से 1985 के बीच ऑल असम स्टूडेन्टस यूनियन सहित कई संगठनों की ओर से पहले गैर राज्य वासियों के विरुद्ध फिर विदेषी होने का आरोप लगाकर बांग्ला भाशी नागिरिकों के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन चला जो बाद में मुस्लिम विरोधी आंदोलन में बदल गया, जिसपर 1985 में ।ेेंउ सहमति के अस्तित्व में आने के बाद विराम लगा।यह समझोता तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की उपस्थिति में केंद्र सरकार, असम सरकार और आंदोलनकारियों के बीच से हुआ था जिसे सभी राजनैतिक और गैर राजनैतिक दलों का व्यापक समर्थन मिला था। इस समझोते के अनुसार 25 मार्च 1971 को आधार (कट आफ तारीख) मानकर उससे पहले असम मंे आ कर बस जाने वालों को नागरिक मान लिया गया था। उसके बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की लीडरशिप में केंद्र सरकार ने संसद में एक संशोधन द्वारा ‘नागरिकता एक्ट-1955’ में धारा 6-। जोड करमंजूरी दी जिस पर उस समय किसी ने कोई आपत्ति नहीं बल्कि मुख्य राजनीतिक दलों कांग्रेस, भाजपा, वाम दलों और गैर राजनीतिक व सामाजिक संगठनों ने इसे स्वीकार किया था।

लेकिन 2009 में और फिर 2012 मेंआसाम सनमेलीटा महासंघ सहित विभिन्न साम्प्रदायिक और स्वार्थी लोगों और संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में पी आई एल नम्बर 274/2009 और 562/2012 फाइल कर दीं और 25 मार्च 1971 के बजाय 1951 की मतदाता सूची को आधार बनाकर असम में नागरिकता का फैसला करने की वकालत की तथा आसाम समझोते की वैधता और संसद द्वारा नागरिकता एक्ट-1955 में धारा 6-। प्रविष्टि करने को भी चुनौती दी, जिसकी वजह से असम के लाखों लोगों पर, बल्कि हर तीसरे व्यक्ति पर नागरिकता अस्वीकार किए जाने का खतरा मंडराने लगा।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जमीयत उलमा हिंद ने महासचिव हजरत मौलाना महमूद मदनी के निर्देष से इन संगठनों के स्टैंड के खिलाफ और असाम एकार्ड समर्थन में सुप्रीम कोर्ट में तुरंत याचिका दाखिल की। इसके बाद ऑल असम माइनरटी स्टूडेंटस एण्ड स्टीज़ंस समिति (सीआरपीसी) नामक संगठन ने भी जमीयत उलेमा हिंद के स्टैंड के साथ सहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके असाम एकार्ड का बचाव के लिए सघर्श षुरू किया। इस समय स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट में एक तरफ लगभग 14 संगठन हैं जो लाखों ग़रीब मुसलमानों को नागरिकता से वंचित करना चाहते है।

 जबकि दूसरी ओर बचाव करने वाले केवल तीन संगठन हैं 

  1. जमीयत उलमा-ए-हिंद (मौलाना महमूद मदनी)

  2. ऑल असम मानरटी व स्टिज़सं डीनटस (आमसो)

  3. नागरिक राइट परिज़र्वेशन समिति (सीआरपीसी) नामक संगठन है ।

 

जो असम एकार्ड के अनुसार 25 मार्च 1971 को आधार बनाकर लाखों वास्तविक नागरिकों को न्याय दिलाने के संघर्ष के लिए 2009 से ही सुप्रीम कोर्ट में मामले लड़ रही है, जिसके लिए देश के वरिष्ठ वकीलों की एक टीम की सेवाएं प्राप्त की गई है।

गौरतलब है कि असम में नागरिकता से संबंधित इन मामलों कीसुनवाई पहले सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ में हो रही थी जिसने असाम समझोते से संबंधित 13, सवाल किए थे और उसका बचाव करने वाले पक्षों को इसका जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। बाद में यह सारे मामलों सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की एक संविधान पीठ के हवाले कर दिए गये। तो पहली मई 2017 को जमीयत उलेमा हिंद ने अपने वरिष्ठ वकीलों द्वारा तैयार किये गये इन 13 सवालों के जवाब और आवश्यक दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट कीं संविधान पीठ में प्रस्तुत कर दिए हैं। अब इन मामलों की अगली सुनवाई 8 मई 2017 से होगी जिस कें फैसला असम के लाखों लोगों की नागरिकता पर प्रभावित होगा।

यहां इस बात का उल्लेख भी उचित होगा कि असम की तरुण गोगोई सरकार इस महत्वपूर्ण समस्या को हल करने की बजाय केवल अपने राजनीतिक हितों की खातिर टाल मटोल करती रही। पिछली राज्य सरकारों द्वारा असम के मुसलमानों के शोषण का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने असम में ‘सीमा पुलिस विभाग’ बनाकर उसे पूरा अधिकार दे दिया कि वह जिसे चाहे विदेशी करार देकर गिरफ्तार करले। हजारों निर्दोष लोग इस विभाग के उत्पीड़न और षोशण का शिकार हो रहे हैं। इस विभाग को आर टी आई अधिनियम के दायरे से बाहर रखकर इस के द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न पर परदा डालने की कोशिश की गई है। गौरतलब है कि देश के अन्य राज्यों में इस तरह का कोई विभाग नहीं है। इसके अलावा असम की पिछली गोगोई सरकार ने भाजपा की केंद्र सरकार द्वारा 31 दिसंबर 2014 तक बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि से आने वाले गैर मुस्लिमों को भारतीय नागरिकता दिए जाने के फैसले के समर्थन की घोशा की थी जिसके लिए केन्द्र सरकार संसद में विधेयक भी पेश कर चुकी है।

बहुत दुखद बात है कि एक तरफ तो सरकार संशोधन विधेयक संसद में पेश कर चुकी है जिसके पास होते ही लाखों विदेशी हिंदू शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता मिल जाएगी, जबकि दूसरी ओर भारत के लाखों वास्तविक नागरिकों को मुसलमान होने की वजह से नागरिकता से वंचित करने की तैयारी चल रही है। न्याय का यह दोहरा पैमाना भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है। जमीयत उलेमा हिंद धर्म के आधार पर नागरिकता के मामले में इस भेद भाव और विभाजन के सख्त खिलाफ है और इसे देश और संविधान से खिलवाड़ मानती है।

इसी तरह गुवाहाटी हाईकोर्ट के 28 फरवरी 2017 को दिए गए पंचायत सचिव द्वारा जारी किये गये प्रमाणपत्र को प्रतिबंधित करार देने वाले फैसले के खिलाफ भी जमीयत उलमा हिंद की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई जो लगभग 48 लाख लोगों विशेष कर महिलाओं की नागरिकता पर प्रभावित हो रही है। इस मामले में भी जमीयत द्वारा सीनियर वकीलों की टीम पैरवी कर रही है। शीर्ष अदालत ने इस सिलसिले में असम के राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर संयोजक को 4 मई 2017 को होने वाली सुनवाई में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।

जमीयत के जिम्मेदार ने आशंका जताई है कि असम के मुसलमानों को रोहिंगा मुसलमानों की तरह बेहैसियत करने की साजिश चल रही है ताकि उनसे भारत की नागरिकता का मौलिक अधिकार छीन कर उन को मतदान के अधिकार से भीवचित कर दिया जाए। जमीयत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैयद मोहम्मद उस्मान मंसूर पूरी और महासचिव मौलाना महमूद मदनी और जमीयत उलेमा प्रांत असम के सदर मोलाना बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व में जमीयत के जिम्मेदारइन सभी हालात पर गहरी नजर रखे हुए हैं और न्याय की जीत के लिए हर स्तर पर कोशिश कर रहे हैं और इंशा अल्लाह न्यायालय से न्याय मिलने की उम्मीद है।