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आज यहाँ दिल्ली के जंतर मंतर पर जमीअत उलमा ए हिन्द के अध्यक्ष मौलाना कारी सैयद मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी के नेत्वत्र में भारत की सभी मुस्लिम्स संघठनों और सोशल ओर्गनेशन ने सर्व सम्मति से इजरायल को आतंकवादी देश करार देते हुए इसके अध्यक्ष रयूलन की भारत आगमन की कड़ी निंदा की है ओ आर भारत सरकार को चेतावनी दी है कि वह आतंकवाद के संबंध में दोहरे मापदंड से बाज़ आये, इस अवसर पर राष्ट्रपति भारत के नाम एक ज्ञापन राष्ट्रपति भवन जा कर दिया गया जिस पर जमीअत उलमा ए हिन्द, जमाते इस्लामी हिंद ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरात, अनहदए, ए आई यूडीएफ, जामिया कलेक्टिवए, ऑल इंडिया तंज़ीम इन्साफए दिल्ली, मेवात विकास सभाए शोल्डर टू शोल्डरए फिलिस्तीन सोलियडरटी कैंपेन लंदन आदि के हस्ताक्षर थे. उसमें भी इजरायल को आतंकवादी देश कहा गया है और भारत से अपने संबंधों पर पुनर्विचार की मांग की गई है. दिल्लीए पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मेवातए बंगाल, ओडिशा से आए दो हज़ार लोग विभिन्न प्रकार के प्ले कार्ड के साथ “रयूलन वापस जाओ” ज़ालिम से गर यारी है देश से गद्दारी है” रयूलन बदआमदीद” जैसे नारे लगा रहै थे। इस मौके पर मौलाना कारी सैयद मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी अध्यक्ष जमीअत उलमा.ए.हिन्द, मोहम्मद सलीम इंजीनियर महासचिव जमाते इस्लामी हिंद, नवेद हामिद अध्यक्ष अखिल भारतीय मुस्लिम मजलिस मुशावरात, शबनम हाशमी अनहद, डॉ ज़फरुल इस्लाम खां, मौलाना जलाल हैदर नकवी संयुक्त सचिव मजलिस उलेमा हिंद, मुफ्ती अफ्फान मंसूरपुरी अमरोहा, मौलाना नियाज़ अहमद फारुकी सदस्य कार्यकारिणी जमीअत उलमा.ए.हिन्द, मौलाना हकीमुद्दीन कासमी सचिव जमीअत उलमा.ए.हिन्द,क़ारी शौकत अली वेट आदि ने संबोधित किया। इसी तरह का प्रदर्शन देश के दूसरे हिस्से में भी आयोजित हुए، बहराइच में मौलाना हयातुल्लाह कासमी सदस्य कार्यकारिणी जमीअत उलमा.ए.हिन्द के नेतृत्व में हज़ारों लोगों ने विरोध किया और वहां के कलेक्टर द्वारा राष्ट्रपति भारत को अपना ज्ञापन प्रस्तुत किया जंतर मंतर पर लोगों ने अनहद द्वारा पेश केए गए बोर्ड पर भी हस्ताक्षर किया जो फिलिस्तीन के समर्थन में उसके दिल्ली एंबेसी को भेजा जाएगा।
यहाँ जंतर-मंतर पर अध्यक्ष मौलाना कारी सैयद मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी ने अपने प्रमुख भाषण में कहा कि इजरायल दुनिया में आतंकवाद का संरक्षक है۔ अपनी स्थापना से लेकर आज तक कोई दिन ऐसा नहीं बीता जब उसने फिलीस्तीनियों को उत्पीड़न न क्या हो ऐसे देश से राजनयिक संबंध का दायरा बढ़ाना बहुत ही दुख की बात है۔ उन्होंने ने कहा कि इस्राएल का मामला दुनिया के अन्य मुद्दों से बिल्कुल अलग हैए वह कुछ शक्तियों की मदद से फिलिस्तीन के राज्य क्षेत्र पर कब्जा किया है और वहां क्रूर रूप से विस्तार करता जा रहा हैए वहां के नागरिकों को अपने खूनी अत्याचार से असहाय कर रहा है, उन्हें हत्या करता है और उनकी बस्तियों पर कब्जा करके दुनिया भर से लोगों को बुलाकर बसता हैंए ऐसे देश के राष्ट्रपति का भारत में स्वागत नहीं किया जा सकता، जमीअत प्रमुख ने कहा के जमीअत आतंकवाद के खिलाफ लंबे अरसे से संघर्ष कर रही हैए वह एक साल पहले 18 नवम्बर को आज के ही दिन इसी जगह पर आईएस का विरोध किया था، आज वहीँ इसराइल के खिलाफ विरोध कर रही है जो दिखाता है कि जमीअत आतंकवाद के संबंध में कोई भेदभाव नहीं करती और न किसी को करने देगी।

इस मौके पर जो ज्ञापन दिया गया उसका मतन ये है:
भारत के राष्ट्रपति को ज्ञापन

आदर्णीय महोदय!

हम आतंकवादी देश इजराइल के राष्ट्रपति रिवलिन की भारत बुलाए जाने और उनके स्वागत की निंदा करते हैं। हिन्दुस्तान ने हमेशा फिलिस्तीनी काज़ का समर्थन किया है तथा इजराईली आक्रामकता, आतंक, अत्याचार व मानव अधिकारों के हनन के शिकार फिलिस्तीनियों के साथ सहानुभूति व्यक्त की है । दशकों से हमारे देश की विदेश नीति मानवाधिकार संरक्षण और विश्व शांति के समर्थन में रही है, लेकिन इन दिनों यह विचलन की राह पर जा रही है। हम लोकतातित्रक भारत के नागरिक अपनी सरकार के इस नीति परिवर्तन को पूरी तरह से गलत और देश की प्राचीन सभ्यता और परम्प्राओं के खिलाफ मानते हुए खारिज करते हैं।

 

इजराइल से भारत के राजनयिक संबंध पच्चीस साल पहले शांति के प्रयास के रूप में स्थापित किये गये थे, जिसका उद्देश्य फिलिस्तीनी जनता को न्याय दिलाने के लिए एक मंच प्रदान करना था। लेकिन इससे फिलीस्तीनी जनता को फ़ायदा नहीं पहुंचा हालांकि इजरायल ऐसे कदमों से ऊर्जा पाकर विश्व शक्तियों से संबंध स्थापित करने में सफल हो गया, यह शक्तियां भी फिलिस्तीन में जारी मानवता विरोधी अत्याचारों में लिप्त हैं 1992 के बाद से भारत और इजराइल के बीच व्यापार, अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, सेन्य सामग्री, शिक्षा और सांस्कृतिक क्षेत्रों सहित सभी मैदानों में संबंधों में वृद्धि हुई लेकिन फिलिस्तीनी जनता शांति और न्याय की स्थापना से अब तक कोसों दूर हैं।


हमारा यह मानना है कि इसराइल और भारत के बीच संबंधों में कोई बात खुश होने और जश्न मनाने का नहीं है। न तो फिलीस्तीनी जनता के लिए और न ही उन भारतीय नागरिकों के लिए जो लोकतंत्र, शांति और मानवाधिकार समर्थक हैं। भारत सरकार यहां के मावता प्रिय लोगों के बहुमत के मत और सोच के खिलाफ इजरायल के अलोकतांत्रिक और पूरी तरह से जातिवादी सरकार के हाथ में हाथ डाल कर चलने की कोशिश कर रही है। 
हम इसराइल के राष्ट्रपति सेंट आर एवलिन के भारत आगमन को जिसका उद्देश्य भारत इजराइल के बीच संबंधों को मजबूत करना है, इसलिए भी अस्वीकार करते हैं क्योंकि यह इसराइल द्धारा लगातार अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकारों के उल्लंघन के समर्थन के बराबर है। इजराइल ने अपने घृणित चरित्र और कार्रवाई से अरब जगत को अशांति का क्षेत्र बना दिया है और बडी संख्या में फिलिस्तीनी नागरिकों को उनके घरों से निकाल कर और उनकी बस्तियों को नष्ट कर के शरणार्थी जीवन जीने पर मजबूर कर रखा है, इसके अलावा 1967 के बाद से अवैध रूप से क़ब्ज़ा लेकर गाजा और पश्चिमी तट की जनता पर हर तरह के अत्याचार को अपना रखा है।


हम भारत के शान्ति प्रिय नागरिक मस्जिदे अक़़सा और दीवार बुराक़ पर मुसलमानों का सर्वोच्च अधिकार स्वीकार करने के संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को के फैसले का स्वागत करते है। मस्जिदे अक़सा मुसलमानों का पहला क़िबला है और बहुत ही सम्मानित मस्जिद है। इसलिए इसका सम्बंध केवल फिलिस्तीन से नहीं बल्कि पूरी दुनिया के मुसलमानों से है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने मजलूम फिलिस्तीनियों के पक्ष में कई फैसले दिए हैं, लेकिन यह बहुत ही निंदनीय है कि इज़राइल अंतरराष्ट्रीय समुदाय और संयुक्त राष्ट्र के निर्णयों का लगातार अपमान और उल्लंघन करता रहा है और विभिन्न तरीक़ों से फिलीस्तीनी बच्चों, महिलाओं और निर्बलों की हत्या करता रहा है। ऐसा लगता है कि इज़राइल अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकार चार्टर की कोई परवाह नहीं है।
आदर्णीय राष्ट्रपति जी!

अतः हम आप के माध्यम से विश्व समुदाय, मुस्लिम जगत और संयुक्त राष्ट्र से मांग करते है कि

1. पूरी तरह संप्रभु स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना के लिए हस्तक्षेप करें, ताकि विस्थापित फिलीस्तीनियों के पुनर्वास और अपने घरों को वापसी का मार्ग खुले तथा इज़राइल को मजबूर किया जाए कि वह अरब अधिकृत क्षेत्रों को ख़ाली कर दे और अपने विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को त्याग दे।


2. गाज़ा की नाकाबंदी तुरंत समाप्त की जाए अगर विश्व समुदाय और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को इज़राइल पालन नहीं करता और वह अंतरराष्ट्रीय मांग के बावजूद नाकाबंदी जारी रख कर लाखों मनुष्यों को क़ैद का जीवन जीने पर मजबूर कर रहा है, तो इज़राइल को एक आतंकवादी देश घोषित करने का प्रस्ताव लाया जाए और उस पर आर्थिक प्रतिबंध लागू किये जाएं। 


3. अब जबकि मस्जिद अक़सा पर मुसलमानों के क़ानूनी अधिकार का फैसला हो गया है, तो उस पर से इज़राइल अपना अवैध क़ब्जा तुरंत हटाए और ओस्लो समझौते के अनुसार पूरे येरोशलम शहर का नियंत्रण फिलिस्तीनियों के हवाले करे। 


4. हम फिलिस्तीन के सम्बंध में भारत की मौजूदा केंद्र सरकार की विमुखता को भारत की चिर स्थापित नीति से विचलन के रूप में देखते है। भारत ने हमेशा फिलिस्तीनियों के संघर्ष और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की हर मंच पर खुल कर समर्थन किया है। हालांकि हाल ही में यूनेस्को में क़िबला अव्वल के संबंध में हुए मतदान से भारत की जान बूझ कर अनुपस्थिति तथा सर्जिकल स्ट्राईक को फिलिस्तीनियों पर इज़राईल के क्रूर हमलों से तुलना पर हम चिंता व्यक्त करते हुए केन्द्र सरकार से मांग करते हैं कि वह महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों की राह पर चलते हुए क्रूर और विस्तारवादी इज़राइल से अपने सम्बंधों में संशोधन करे और दुनिया भर में पीड़ितों के प्रति भारत की मित्रता की परंपरा का उल्लंघन न करे।

ईसराइल के राष्ट्रपति और फलस्तीन पर जुल्म के खिलाफ जमीअत का प्रदर्शन ​राष्ट्रपति के जमीअत उलमा के अध्यक्ष कारी उस्मान साहब का ज्ञापन